अमेरिकी कंपनी के सामने विदेशी इनवॉइस की समस्या
जब कोई अमेरिकी कंपनी किसी विदेशी ठेकेदार से इनवॉइस पाती है, तो उनकी फाइनेंस टीम के लिए यह रोज़ का काम नहीं होता। उन्हें अंतरराष्ट्रीय भुगतान से जुड़े नियमों, कर फॉर्म और बैंक विवरण को समझना पड़ता है।
कई बार उन्हें विदेशी मुद्रा में भुगतान करना होता है, जिससे अतिरिक्त शुल्क और देरी जुड़ जाती है। कंपनी के खाता विभाग को यह भी सुनिश्चित करना होता है कि कर कटौती के नियम पूरे हों, और इसके लिए उन्हें बाहरी सलाहकार की जरूरत पड़ सकती है।
ऐसे में इनवॉइस अक्सर मंज़ूरी के लिए कई हाथों से गुजरता है, और आपका भुगतान लटक जाता है।
जब इनवॉइस किसी अमेरिकी कंपनी से आता है
PANORAMA payments के साथ, आपके क्लाइंट को इनवॉइस एक अमेरिकी कंपनी से मिलता है। उनके लिए यह किसी अन्य अमेरिकी विक्रेता से मिलने वाले बिल जैसा ही होता है।
वे ACH या वायर के जरिए डॉलर में भुगतान करते हैं, और जरूरत पड़ने पर W-9 फॉर्म उपलब्ध होता है। उनकी फाइनेंस टीम को कोई अतिरिक्त कागजी कार्रवाई नहीं करनी पड़ती।
इससे भुगतान की प्रक्रिया तेज़ और सरल हो जाती है, और आपका काम बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ता है।
आपके काम का तरीका और बिलिंग
SDR का काम अक्सर परियोजना आधारित होता है: कुछ महीनों के लिए आउटबाउंड सीक्वेंस चलाना, या एक निश्चित संख्या में मीटिंग बुक करना। आप अपना इनवॉइस हमेशा की तरह बनाते हैं, लेकिन उसे अमेरिकी कंपनी के नाम से जारी किया जाता है।
आप महीने के अंत में एक ही राशि का इनवॉइस दे सकते हैं, या हर हफ्ते काम किए गए घंटों के हिसाब से। कुछ SDR किसी खास काम, जैसे लिस्ट सफाई या सीक्वेंस सेटअप, के लिए एकमुश्त शुल्क लेते हैं।
PANORAMA payments आपके काम के तरीके में दखल नहीं देता। आप अपने क्लाइंट के साथ जो भी शर्तें तय करते हैं, वही इनवॉइस पर दिखती हैं।
कमीशन आधारित कमाई और हर बार अलग इनवॉइस
कई SDR को बेस पे के साथ कमीशन मिलता है, जो बुक की गई मीटिंग या क्लोज़ हुए डील पर निर्भर करता है। इसलिए हर महीने की इनवॉइस राशि अलग हो सकती है।
इससे क्लाइंट की फाइनेंस टीम को हर बार यह देखना पड़ता है कि किस काम के लिए कितना पैसा मांगा जा रहा है। अगर इनवॉइस किसी अमेरिकी कंपनी से आता है, तो यह समीक्षा आसान हो जाती है क्योंकि उन्हें विदेशी भुगतान की जटिलताओं से नहीं जूझना पड़ता।
आप अपनी इनवॉइस पर साफ-साफ लिख सकते हैं कि कितनी मीटिंग बुक हुईं, किस डील में क्या योगदान रहा, और कमीशन कैसे तय हुआ। इससे पारदर्शिता बढ़ती है और भुगतान में देरी की संभावना घटती है।
